Now Live News

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद HC के विवादास्पद ‘ब्रेस्ट पकड़ना’ फैसले पर रोक लगाई 2025

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद HC के विवादास्पद ‘ब्रेस्ट पकड़ना’ फैसले पर रोक लगाई

इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) HC की एक हालिया टिप्पणी ने पूरे देश में आक्रोश और विवाद पैदा कर दिया था। उच्च न्यायालय ने एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा था कि “ब्रेस्ट (स्तन) पकड़ना बलात्कार (Rape) नहीं है”। इस टिप्पणी ने न केवल कानूनी और सामाजिक विशेषज्ञों को चौंका दिया, बल्कि महिलाओं के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों और आम नागरिकों के बीच भी गहरी नाराजगी उत्पन्न की। इस विवादास्पद टिप्पणी पर संज्ञान लेते हुए, भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने तत्काल हस्तक्षेप किया और इलाहाबाद उच्च न्यायालय के इस फैसले पर रोक लगा दी।

यह मामला एक नाबालिग लड़की के साथ यौन उत्पीड़न से जुड़ा था। आरोपी पर बलात्कार और यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम के तहत आरोप लगाए गए थे। इलाहाबाद उच्च न्यायालय HC ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि चूंकि आरोपी ने पीड़िता के साथ कोई और शारीरिक संबंध नहीं बनाए, इसलिए केवल ब्रेस्ट पकड़ना बलात्कार की परिभाषा में नहीं आता है।

उच्च न्यायालय HC की इस टिप्पणी ने तुरंत ही कानूनी समुदाय और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच एक बहस छेड़ दी। कई लोगों ने इस टिप्पणी को बेहद संकीर्ण और महिलाओं के प्रति असंवेदनशील बताया। उनका तर्क था कि बलात्कार की परिभाषा में केवल योनि प्रवेश ही शामिल नहीं है, बल्कि किसी भी तरह का यौन हमला जो किसी महिला की गरिमा का उल्लंघन करता है, वह बलात्कार की श्रेणी में आना चाहिए।

राष्ट्रीय महिला आयोग (National Commission for Women – NCW) ने भी इस टिप्पणी की कड़ी निंदा की और इसे महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन बताया। आयोग ने इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करने और इलाहाबाद उच्च न्यायालय HC के फैसले को पलटने की मांग की।

विभिन्न सामाजिक संगठनों और महिला अधिकार समूहों ने भी इस टिप्पणी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किए। उन्होंने इस टिप्पणी को महिलाओं के प्रति पितृसत्तात्मक और लैंगिक भेदभावपूर्ण मानसिकता का प्रतीक बताया। उन्होंने मांग की कि इस तरह की टिप्पणियों को बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए और न्यायपालिका को महिलाओं के अधिकारों के प्रति अधिक संवेदनशील होना चाहिए।

इस बढ़ते दबाव और विवाद को देखते हुए, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में हस्तक्षेप करने का फैसला किया। सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय HC के फैसले पर रोक लगाते हुए कहा कि यह टिप्पणी प्रथम दृष्टया गलत और महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले की आगे की सुनवाई के लिए एक विशेष पीठ का गठन किया है।

सर्वोच्च न्यायालय HC के इस फैसले का स्वागत करते हुए, महिला अधिकार कार्यकर्ताओं और कानूनी विशेषज्ञों ने कहा कि यह महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने उम्मीद जताई कि सर्वोच्च न्यायालय इस मामले में उचित निर्णय देगा और बलात्कार की परिभाषा को व्यापक बनाने में मदद करेगा।

यह घटना भारतीय न्यायपालिका में लैंगिक संवेदनशीलता की आवश्यकता को उजागर करती है। यह जरूरी है कि न्यायाधीश और वकील महिलाओं के अधिकारों के प्रति संवेदनशील हों और ऐसे फैसले देने से बचें जो महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण हों या उनकी गरिमा को कम करते हों।

यह मामला यौन उत्पीड़न और बलात्कार के मामलों में न्याय की प्रक्रिया को बेहतर बनाने की आवश्यकता को भी दर्शाता है। यह जरूरी है कि ऐसे मामलों की सुनवाई त्वरित और संवेदनशील तरीके से की जाए और पीड़ितों को न्याय मिल सके।

सर्वोच्च न्यायालय HC का यह फैसला महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है। यह दिखाता है कि न्यायपालिका महिलाओं के अधिकारों के प्रति संवेदनशील है और वह महिलाओं के साथ होने वाले किसी भी तरह के अन्याय को बर्दाश्त नहीं करेगी। यह उम्मीद की जाती है कि सर्वोच्च न्यायालय इस मामले में एक ऐसा निर्णय देगा जो महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करेगा और उन्हें यौन उत्पीड़न और बलात्कार से बचाने में मदद करेगा।

यह मामला समाज में लैंगिक समानता और महिलाओं के सम्मान को बढ़ावा देने की आवश्यकता को भी दर्शाता है। यह जरूरी है कि हम लैंगिक भेदभावपूर्ण मानसिकता को चुनौती दें और एक ऐसा समाज बनाएँ जहाँ सभी महिलाओं को सुरक्षित और सम्मानित महसूस हो।

यह घटना भारतीय न्यायपालिका HC के लिए एक सबक है। यह न्यायपालिका को लैंगिक समानता और महिलाओं के अधिकारों के प्रति अधिक संवेदनशील होने के लिए प्रेरित करेगी। यह घटना महिलाओं को भी अपने अधिकारों के लिए लड़ने और न्याय की मांग करने के लिए प्रोत्साहित करेगी।

सुप्रीम कोर्ट.HC का हस्तक्षेप यह दिखाता है कि न्यायपालिका महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध है. यह फैसला महिलाओं के लिए एक उम्मीद की किरण है और यह संदेश देता है कि न्यायपालिका उनके साथ है।

रायसीना डायलॉग 2025: 125 देशों के प्रतिनिधि होंगे शामिल, New Zealand के पीएम पहुंचे दिल्ली

Leave a Comment